
डा.चन्द्र प्रभाकर कोकड़ा
25 जुलाई 1942 को जन्मे देवस्थलों से शोभायमान छोटी काशी के नाम से विख्यात भिवानी के महान दार्शनिक साहित्य साधक,कवि, लेखक ,चिंतक एवं अध्यात्मवेता श्री चंद्र प्रभाकर कोकड़ा को उनके सृजनात्मक लेखन के लिए “हरियाणा गौरव सम्मान 2009” में दिया गया।
उनका ईश प्रेम साकार ,निराकार ,रूप ,रंग ,संप्रदाय ऊंच नीच धर्म, भाषा और काल क्षेत्र आदि की सीमाओं से परे सर्वग्राह्य है।
साहित्य जगत के लिए गौरव का क्षण है “शांति ही धर्म” पुस्तक सभी धर्मो के सार को समेटे यह 21वीं कृति सभी पाखंडों से मुक्ति दिलाती हुई एनलाइटमेंट समाधि जैसे गूढ़ विषयों पर भी प्रकाश डालती है। शून्य, प्रेम, कर्म, आदि अनेक विषयों को २00 से अधिक शीर्षकों के माध्यम से समझाया है।
यह नई पुस्तक उनके वर्षों के चिंतन और शोध का परिणाम है । यह पुस्तक केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि मानवता और अध्यात्म के अंतर्सबंधों की खोज है। वर्तमान समय के द्वंदों को समझा कर आध्यात्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करती है।
यह पुस्तक न केवल दार्शिनिकों के लिए बल्कि शांति की खोज में हर साधारण मनुष्य के लिए भी एक मार्गदर्शिका साबित होगी ।मानवता का सबसे बड़ा और एकमात्र धर्म शांति ही है। यह पुस्तक मानवता के उस सामूहिक स्वप्न को समर्पित है जहां हृदय में शांति और जीवन में प्रेम ही एकमात्र धर्म है।
विगत कई दशकों से पत्रकारिता और साहित्य क्षेत्र में सक्रिय डा. चन्द्र प्रभाकर कोकड़ा एक प्रखर लेखनी के धनी है ।संपादक के रूप में समाज की नब्ज टटोलने के साथ-साथ आपकी मूल पहचान एक गंभीर आध्यात्मिक साधक की रही है। आपकी आध्यात्मिक रचनाओं और भजनों की व्यापकता का प्रमाण डिजिटल जगत में भी स्पष्ट है। आपकी सुप्रसिद्ध रचनाएं और भजन Bhajansamrat.com जैसे प्रतिष्ठित पोर्टल पर उपलब्ध हैं। जिन्हें विश्व भर के जिज्ञासुओं द्वारा गूगल के माध्यम से सराहा जाता है।भक्ति और दर्शन का संगम एक दार्शनिक लेखक के साथ उच्च कोटि के रचनाकार के रूप में प्रतिस्थापित करता है। मातृभाषा हिंदी के संरक्षण और उत्थान हेतु सन 1957 के ऐतिहासिक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और कारागार में रहते हुए भी हिंदी साहित्य के सृजन की उनकी लेखनी कभी नहीं रुकी ।
"शांति ही धर्म” अध्यात्मिक दर्शन की एक दुर्लभ यात्रा है। इस गहन शोध पूर्ण ग्रंथ में लेखक ने विश्व के समस्त धर्मों के मूल दर्शन को एक सूत्र में पिरोया है। यह पुस्तक तर्क देती है कि मानवता का सबसे बड़ा और एकमात्र धर्म शांति ही है।चाहे आप आध्यात्मिक खोजी हो, दर्शन के विद्यार्थी हों या मानसिक शांति की तलाश में एक साधारण पाठक, यह पुस्तक आपके जीवन की दिशा बदलने की क्षमता रखती है।यह केवल एक पुस्तक नहीं कालजई रचना है । साहित्य जगत के लिए यह गौरव का क्षण है ,जिसे आध्यात्मिक जगत में एक दुर्लभ ग्रंथ के रूप में देखा जा रहा है। यह नई पुस्तक वर्षों की चिंतन और दुर्लभ शोध का परिणाम है। यह ग्रंथ अध्यात्म और दर्शन की गहराइयों को समेटे हुए हैं।
उन जिज्ञासु पाठकों को जो मजहब की दीवारों से ऊपर उठकर शांति के वास्तविक धर्म को खोजने की राह पर हैं। मनुष्य तमाम धार्मिक कर्मकांडों के बावजूद आज भी सबसे अधिक अशांति में जी रहा है। और सभी धर्म के उस साझा सत्य को खोजने का प्रयास किया है, जिसे हम अक्सर शोर शराबे में भूल जाते हैं। शांति ही धर्म केवल एक पुस्तक नहीं बल्कि उस विश्वास का एक दस्तावेज है कि मानवता का कल्याण केवल आंतरिक और बाहरी शांति के माध्यम से ही संभव है। 200 से अधिक शीर्षकों के माध्यम से शांति के दर्शन को समझाया है। लेखनी केवल कागजों तक सीमित नहीं है, रचनाएं और भजन Bhajansamrat.com पर उपलब्ध हैं और गूगल पर विश्व के पाठकों द्वारा खोजी और पढ़ी जाती है। हिंदी साहित्य जगत में यह 21वी कृति है। यह पुस्तक युवाओं के नैतिक उत्थान और समरसता के लिए मील का पत्थर साबित होगी। वर्तमान विश्व में बढ़ते मानसिक तनाव,वैमनस्य और अशांति के बीच यह दुर्लभ कृति शांति को किसी धर्म की सीमा में न बांधकर इसे परम धर्म के रूप में स्थापित करती है ।यह पुस्तक मेरे जीवन का निचोड़ है,जिसे मैं समाज को सौंप रहा हूं।
"उस 'शून्य' के नाम...
जहाँ से हर शब्द का जन्म होता है,
और जहाँ पहुँचकर हर शब्द मौन हो जाता है।
जहाँ से मैं आया हूँ,
जिसकी मैं साधना करता हूँ,
और जिसमें एक दिन मुझे विलीन हो जाना है।
यह कृति उस निराकार, अनंत और असीम 'शून्य' को सादर समर्पित है।"
"अंक मिट जाते हैं, शब्द खो जाते हैं, अंत में जो बचता है, वही 'शून्य' है... और वही मैं हूँ।"
-डा.चन्द्र प्रभाकर कोकड़ा
कवि/ साहित्यकार
बिचला बाजार,
भिवानी -127021(हरियाणा)
मोबाइल: 9992075303
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1. डिजिटल संस्करण (Digital Version - PDF):
मानवता की सेवा और आध्यात्मिक प्रसार के उद्देश्य से, डॉ. चन्द्र प्रभाकर कोकड़ा जी का समस्त साहित्य (जैसे: समर्पण, शान्ति ही धर्म) इस वेबसाइट पर पूर्णतः निःशुल्क (Free) उपलब्ध है। आप इन्हें यहाँ से कभी भी पढ़ या डाउनलोड कर सकते हैं।
लेखक एवं सर्वाधिकारी: डॉ. चन्द्र प्रभाकर कोकड़ा
● प्रकाशन विवरण: यह कृति लेखक द्वारा जन-कल्याण हेतु स्वयं के संसाधनों से प्रकाशित की गई है।
● वितरण: इसका उद्देश्य व्यापार नहीं, बल्कि विचारों का प्रसार है।
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